Friday, July 3, 2020

नीलाम यहाँ जो

ग़ज़ल

नीलाम यहाँ जो सरे-बाज़ार हुए हैं
अब लोग वही साहिबे-किरदार हुए हैं

ऐ चारागरो ! हमको न बीमार समझना
हम उनकी मुहब्बत में गिरिफ़्तार हुए हैं

क्या ख़ूब मुहब्बत का सिला मुझको मिला है
जो भूल गए थे वो तलबगार हुए हैं

इस दौरे-तरक़्क़ी की करामात तो देखो
कल तक जो लुटेरे थे वो ज़रदार हुए हैं

उसने जो मुझे प्यार से देखा तो लगा ये
वीरान चमन फिर सभी गुलज़ार हुए हैं

ये ही तो मुहब्बत की छुअन का है करिश्मा
काग़ज़ के थे जो फूल महकदार हुए हैं

हर एक ख़बर क़त्लो-तबाही में सनी है
लगता है कि मक़्तल सभी अख़बार हुए हैं

सुनते हैं किसी की ये कब,अपनी हैं चलाते
बच्चों से तो माँ-बाप भी लाचार हुए हैं।
     
-तूलिका सेठ

आज परिन्दे

आज परिन्दे सहमे-सहमे
रहते सभी घरों में हैं
संशय धुंध सभी के मन में
उड़ते सभी अकेले हैं
घर बाहर आंतकित जीवन
फूले-फले झमेले हैं
लय,गति,ताल सभी रूठे हैं
जीवन नहीं सुरों में है
मन बुनता है मीठे सपने
जीवन हो नन्दन कानन
पुष्पित हो हर डाली-डाली
निर्भय हों आँगन-आँगन
जाति धर्म के भेद कई हैं
फ़र्क न सुर असुर में है
कौन मित्र है कौन शत्रु यह
कह पाना कितना मुश्किल
संवेदन की गाँठें उलझी
कौन सुने,मन की हलचल
भेद कुहासा उड़ता जाए
ताकत नहीं परों में है।
     
-तूलिका सेठ

Thursday, July 2, 2020

मार्मिक इतिहास पर

       ग़ज़ल

मार्मिक इतिहास पर भी वो अभागा मौन है
घोर उस संत्रास पर भी वो अभागा मौन है

धर्म के इतिहास को जो ढो रहा अज्ञान से
टूटते विश्वास पर भी वो अभागा मौन है

चिर गुलामी के लिए जो हो रहे षडयंत्र अब
काम वैसे खास पर भी वो अभागा मौन है

उसको शिक्षा, घर, चिकित्सा, काम तक मिलता नहीं
नेता के घर रास पर भी वो अभागा मौन है

वोट इनको दे दिया था उनसे हो कर के निराश
टूटती अब आस पर भी  वो अभागा मौन है

धर्म की खुशबू के अंदर दासता की तीक्ष्ण सी
आ रही उस बास पर भी वो अभागा मौन है

-वी. के. शेखर

घर के अंदर बैठे हैं

घर के अंदर बैठे हैं
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घर के अंदर बैठे हैं
कहिए मालिक, कैसे हैं

सोशल दूरी रखे हुए
जीवित जैसे तैसे हैं

रोज कमाके खाते जो
पता नहीं अब कैसे हैं

फ्रंट लाइन के योद्धा
भी तो अपने जैसे हैं

मानें जादू टोने को
लोग यहाँ के कैसे हैं

सभी नज़ूमी मौन रहे
सोचो वो सब कैसे हैं

धर्मों के घर बंद हुए
कैसे थे अब, कैसे हैं

वैज्ञानिक हल खोज रहे
तब तक बाक़ी बैठे हैं

बात करें जो तर्कों की
कहते ऐसे वैसे हैं

दूर देश से वो वापस
लौटे जैसे तैसे हैं

वो भी खाने को तरसें
जिनकी जेब में पैसे हैं

घर में साजन 'शेफ' हुए
बंद हुए जो 'कैफे' हैं

घायल जिनसे आज हैं वो
शब्द, वाण के जैसे हैं

बैठे ठाले ही 'शेखर'
शेर लिखे जो, कैसे हैं

-वी. के. शेखर

Wednesday, July 1, 2020

सब को मालूम है मैं शराबी नहीं

अनवर फर्रुखाबादी


सब को मालूम है मैं शराबी नहीं
फिर भी कोई पिलाए तो मैं क्या करूँ
सिर्फ़ एक बार नज़रों से नज़रें मिलें
और क़सम टूट जाए तो मैं क्या करूँ

मुझ को मयकश समझते हैं सब वादाकश
क्यूँकि उनकी तरह लड़खड़ाता हूँ मैं
मेरी रग रग में नशा मुहब्बत का है
जो समझ में ना आए तो मैं क्या करूँ

हाल सुन कर मेरा सहमे-सहमे हैं वो
कोई आया है ज़ुल्फ़ें बिखेरे हुए
मौत और ज़िंदगी दोनों हैरान हैं
दम निकलने न पाए तो मैं क्या करूँ

कैसी लूट कैसी चाहत कहाँ की खता
बेखुदी में हाय अनवर खिदू(?) का नशा
ज़िंदगी एक नशे के सिवा कुछ नहीं
तुम को पीना न आए तो मैं क्या करूँ

-अनवर फर्रुखाबादी


सीमाओं में कहाँ बँधा है

सीमाओं में कहाँ बँधा है

सीमाओं में कहाँ बँधा है
प्रतिभाओं का तार
गगन के जाना जिनको पार
गगन के जाना जिनको पार

लिये हाथ में श्रम की लाठी
रच लेते ये नव परिपाटी
सपने आसमान के लेकिन
पाँव तले रहती है माटी
अपनी कूवत से कर लेते
सात समंदर पार
गगन के ...........

चाँद तोड़ अमृत निचोड़ लें
बरसाती जलधार मोड़ दें
टूटे हुए शिकारे कश्ती
जब चाहे ये उन्हें जोड़ दें
पाँव  वक्त के सिर पर
रखने को हर दम तैयार
गगन के ...........

ये संघर्षों का प्रतिफल है
महाउदधि में मीठा जल है
नैराश्यों के बियावान में
एकमात्र ये ही सम्बल हैं
ये प्रलयी अंधड के आगे
भरते हैं हुंकार
गगन के ...........

-सोनम यादव

Tuesday, June 30, 2020

हाइकु कविताएँ

हाइकु


-01-

सपना बुना
अहिंसा पुजारी ने
सत्य ही चुना

-सोनम यादव



-02-

मनीप्लांट पे
करती है बसेरा
भोली चिड़िया

-सोनम यादव


-03-
गुस्सा करती
फुदकती गौरैया
आ जाती घर 

-सोनम यादव



-04-
जाने क्या लेने
आ जाती थी गौरैया
घर भीतर

-सोनम यादव


-05-
 किसे रिझाता
पंखों में चाँद बाँधे 
जंगली मोर 

-सोनम यादव


-06-
गेहूं के दाने
घूरती घूम घूम
नन्हीं चिड़िया

-सोनम यादव


-07-
गली मोहल्ले
उग आये सन्नाटे 
बोये किसने 

-सोनम यादव


-08-
आँख घुमाती
रगड़ लेती चोंच
दाना चुगती

-सोनम यादव


-09-
बया करता
नयी कशीदाकारी
ले आता बहू

-सोनम यादव