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Thursday, July 2, 2020

मार्मिक इतिहास पर

       ग़ज़ल

मार्मिक इतिहास पर भी वो अभागा मौन है
घोर उस संत्रास पर भी वो अभागा मौन है

धर्म के इतिहास को जो ढो रहा अज्ञान से
टूटते विश्वास पर भी वो अभागा मौन है

चिर गुलामी के लिए जो हो रहे षडयंत्र अब
काम वैसे खास पर भी वो अभागा मौन है

उसको शिक्षा, घर, चिकित्सा, काम तक मिलता नहीं
नेता के घर रास पर भी वो अभागा मौन है

वोट इनको दे दिया था उनसे हो कर के निराश
टूटती अब आस पर भी  वो अभागा मौन है

धर्म की खुशबू के अंदर दासता की तीक्ष्ण सी
आ रही उस बास पर भी वो अभागा मौन है

-वी. के. शेखर

घर के अंदर बैठे हैं

घर के अंदर बैठे हैं
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घर के अंदर बैठे हैं
कहिए मालिक, कैसे हैं

सोशल दूरी रखे हुए
जीवित जैसे तैसे हैं

रोज कमाके खाते जो
पता नहीं अब कैसे हैं

फ्रंट लाइन के योद्धा
भी तो अपने जैसे हैं

मानें जादू टोने को
लोग यहाँ के कैसे हैं

सभी नज़ूमी मौन रहे
सोचो वो सब कैसे हैं

धर्मों के घर बंद हुए
कैसे थे अब, कैसे हैं

वैज्ञानिक हल खोज रहे
तब तक बाक़ी बैठे हैं

बात करें जो तर्कों की
कहते ऐसे वैसे हैं

दूर देश से वो वापस
लौटे जैसे तैसे हैं

वो भी खाने को तरसें
जिनकी जेब में पैसे हैं

घर में साजन 'शेफ' हुए
बंद हुए जो 'कैफे' हैं

घायल जिनसे आज हैं वो
शब्द, वाण के जैसे हैं

बैठे ठाले ही 'शेखर'
शेर लिखे जो, कैसे हैं

-वी. के. शेखर